जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। बढ़ते वैश्विक तापमान से अल-नीनो जैसी घटनाओं की इंटेंसिटी और फ्रिक्वेंसी बढ़ रही है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में जहां मानसून पर 50% से अधिक खेती निर्भर है, यह संकट खाद्य सुरक्षा के लिए घातक साबित हो सकता है। गर्मी की लहरें, अनियमित बारिश, मिट्टी में नमी की कमी और कीट-रोगों का बढ़ता प्रकोप फसलों की पैदावार को और कम कर रहे हैं हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, बावजूद इसके यह कहना मुनासिब नहीं होगा कि भारत पूरी तरह तैयार है ।वास्तव में,किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है।
भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अलनीनो बेहद अहम है क्योंकि भारतीय मानसून पर इसका प्रत्यक्ष असर होता है। धान की खेती पर अलनीनो का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर माना जाता है वहीं कमजोर मानसून से खेती में अप्राकृतिक कीटो का दौर बढ़ना, और फूड सप्लाई और प्राइस पर दबाव बढ़ सकता है।
समग्रता से देखा जाए तो मानसून की उपस्थिति, टाइमिंग के साथ साथ महत्वपूर्ण यह है कि मानसून की स्टेबिलिटी और रिटेंशन कितना है क्योंकि यही दो कारक कृषि कर्मण को प्रत्यक्ष प्रभावित करते हैं
बहरहाल यह भारतीय कृषि के परिप्रेक्ष्य में सही समय है कि अब कृषि को क्लाइमेट-स्मार्ट बनाया जाए। बेशक भारत में सोयल फर्टिलिटी और किसानों का जज्बा सदैव से बेहतरीन एवं जुझारूपन लिए रहा है, लेकिन प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना अब समय की पहली शर्त है और अब इस मामले में किसी प्रकार की देरी गैरजरूरी होगी क्योंकि ना फसलें इंतजार नहीं करतीं है और ना मौसम..!
Durga Sharan Dubey
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