"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए"
बशीर बद्र साहब केवल एक उर्दू शायर का नाम नहीं है, बल्कि उस जज्बाती तहजीब का आईना है जो भीड़ में भी हर एक इंसानी रूह की धड़कन को माप सकता है , बेशक आज वे इक अकेले सफर पर निकल गए है लेकिन अपनी तमाम रचनाओं में उनकी मौजूदगी बखूबी दिखती है।
अयोध्या (फैजाबाद) के एक साधारण मुस्लिम परिवार में जन्मे सैयद मुहम्मद बशीर साब का सफर पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ ,उस दौर में भी PhD तालीम हासिल करने तक चला। उनकी रचनाओं में उनके स्ट्रगल, उनकी संजीदगी, बांकपन और जिंदगी के तजुर्बे साफ झलकते है
" सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा"
मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में उनका घर जल गया, अप्रकाशित रचनाएं स्वाहा हो गईं, पहली पत्नी पहले ही गुजर चुकी थीं। इतना सब कुछ खोने के बावजूद उनकी रचनाओं में, उनके ताल्लुकातों में कड़वाहट नहीं आई । मेरठ से भोपाल शिफ्ट हुए और नई शुरुआत की ।
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों"
इकाई, इमेज, आमद , आस, आहट, कुल्लियात ए बशीर बद्र, उजाले अपनी आंखों के आदि तमाम रचनाएं फिलॉस्फी और तजुर्बे का शानदार संकलन है जिसमें झांक कर, हकीकत से रूहानियत तक का सफर बड़ी आसानी से मुक्कमल सा हो जाता है । देखा जाए तो बशीर बद्र की ज़िंदगी दरअसल एक मुसाफ़िरी तजुर्बे की पोटली है उनके शेरों शायरी में यह बंजारापन खूब सजता फबता है
"मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी
कहीं मिलकर चले तो सही"
उनके नज़्मों की अजीब खासियत है कि... जब भी पढ़ा गया उनको तब कभी एहसास नहीं हुआ कि बशीर साब को पढ़ रहे हैं, यूं लगता था कि ये तो अपनी सी बात है ....बिल्कुल पारंपरिक उस्तादों से अलग, सरल शब्दों में गहरे अर्थ से सजी रात की लोरियों की मुआफिक , जो हल्की थपकी से हर गम को तनु कर देती है .
"दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम...
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे"
खैर, बशीर साब की उम्र बढ़ने के साथ डिमेंशिया ने उनकी यादों को छीन लिया, और बेशक बशीर साब जेहनी रूप से हमारे बीच में नहीं है लेकिन मुझे यकीन है कि तारो की ओट से, देख और जान रहे होंगे कि उनकी शायरी, उनकी विरासत ;उन तमाम आम शहरियों के लिए एक मशाल की मानिंद है जो अंधेरी रातों में उम्मीद के चरागो को रोशन रखने की ख्वाहिश रखते हैं।
"ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे"
अलविदा बशीरबद्र साहब ....!
Durga Sharan Dubey
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