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महुआ डाबर संग्रहालय : वर्ष 2025 — एक बीते साल की ऐतिहासिक यात्रा, स्मृति, संघर्ष और उपेक्षा



बस्ती: उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के बहादुरपुर ब्लॉक में स्थित महुआ डाबर संग्रहालय केवल ईंट-पत्थरों से बना कोई साधारण भवन नहीं है, बल्कि यह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अध्याय का जीवित साक्ष्य है, जिसे लंबे समय तक इतिहास के हाशिये पर धकेल दिया गया। यह वह स्थान है जहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और देशभक्त गांव को पूरी तरह जला दिया, हजारों ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया और महुआ डाबर को ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर दिया, ताकि इस गांव का नामो-निशान तक मिट जाए।


महुआ डाबर संग्रहालय इसी भूले-बिसरे, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण इतिहास को दस्तावेजों, दुर्लभ सामग्रियों और स्मृतियों के माध्यम से सहेजने का एक सतत प्रयास है। वर्ष 2025, इस संग्रहालय के लिए केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं रहा, बल्कि यह स्मरण, शोध, संवाद, सम्मान और संघर्ष का ऐसा कालखंड बना, जिसने महुआ डाबर को राष्ट्रीय चेतना के मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित किया।
भूला दिया गया इतिहास, जिसे संग्रहालय ने जीवित किया

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महुआ डाबर गांव कंपनोराज के खिलाफ संगठित प्रतिरोध का केंद्र था। यहां के ग्रामीणों ने हथियार उठाकर विदेशी शासन को चुनौती दी। इसके प्रतिशोध में अंग्रेजों ने गांव को पूरी तरह नष्ट कर दिया। गांव जला दिया गया, लोग मारे गए और सरकारी दस्तावेजों में इसे ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर दिया गया। यह केवल भौतिक विनाश नहीं था, बल्कि स्मृति का भी संहार था।
महुआ डाबर संग्रहालय ने इस इतिहास को फिर से जीवित करने का बीड़ा उठाया। पिछले ढाई दशक से यह संग्रहालय शोधार्थियों, इतिहासकारों, पत्रकारों और विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुसंधान केंद्र बना हुआ है। यहां संग्रहीत दस्तावेज, सिक्के, तलवारें, हथियार, ब्रिटिश कालीन अभिलेख और मौखिक इतिहास की सामग्री उस नरसंहार और स्थानीय क्रांतिकारियों की गाथा को सामने लाती है, जिसे कभी दबाने की कोशिश की गई थी।

वर्ष 2025 : आयोजनों से भरा एक स्मरणीय वर्ष

वर्ष 2025 में महुआ डाबर संग्रहालय की गतिविधियां अभूतपूर्व रहीं। इस पूरे वर्ष संग्रहालय केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक चलायमान विचार बन गया, जो उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों और संस्थानों तक पहुंचा।
(1) 3 और 4 फरवरी को गोरखपुर के सेंट एंड्रयूज पीजी कॉलेज में चौरी-चौरा जनविद्रोह पर दुर्लभ दस्तावेजों की प्रदर्शनी और विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इस आयोजन में चौरी-चौरा की ऐतिहासिक घटना को नए शोध निष्कर्षों और दुर्लभ अभिलेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। यह कार्यक्रम युवाओं और शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायक रहा।
(2) 27 और 28 फरवरी को शाहजहांपुर में काकोरी ट्रेन एक्शन शताब्दी समारोह का आयोजन किया गया। इस आयोजन ने काकोरी एक्शन के नायकों के बलिदान को नए संदर्भों में सामने रखा और यह बताया कि यह घटना केवल एक ‘डकैती’ नहीं, बल्कि ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती थी।
(3) 10 जून को बस्ती स्थित क्रांति स्थल महुआ डाबर में शस्त्र सलामी, दुर्लभ सामग्रियों की प्रदर्शनी, स्वास्थ्य शिविर, संकल्प सभा और मशाल सलामी का आयोजन किया गया। यह दिन महुआ डाबर क्रांति दिवस को समर्पित रहा, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
(4) 3 जुलाई को ‘हजारों शहीदों की जमींदोज बस्ती’ स्मरण दिवस मनाया गया। यह आयोजन भावनात्मक रूप से अत्यंत मार्मिक रहा, जिसमें उस गांव के अस्तित्व मिटा दिए जाने की पीड़ा और शहीदों की स्मृति को साझा किया गया।
(5) 27 जुलाई को ‘महुआ डाबर का इतिहास : उत्खनित साक्ष्यों के संदर्भ में’ विषय पर एक वेबीनार का आयोजन हुआ, जिसमें प्रोफेसर अनिल कुमार ने अपने शोध अनुभव साझा किए। इस वेबीनार ने महुआ डाबर के इतिहास को पुरातात्विक और अकादमिक दृष्टि से समझने का नया दृष्टिकोण दिया।
(6) 3 अगस्त को ‘महुआ डाबर की कहानी : लतीफ अंसारी की जुबानी’ संवाद सत्र आयोजित किया गया। मौखिक इतिहास के इस सत्र ने पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही स्मृतियों को दर्ज करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
(7) 6, 7 और 8 अगस्त को लखनऊ स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में काकोरी ट्रेन एक्शन शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन हुआ। इसमें देश-विदेश की प्रमुख शख्सियतों, न्यायमूर्ति, इतिहासकारों और विद्वानों ने भाग लिया। यह आयोजन महुआ डाबर संग्रहालय की राष्ट्रीय पहचान को और सुदृढ़ करने वाला साबित हुआ।
(8) 14 अगस्त को महुआ डाबर संग्रहालय में काकोरी शताब्दी विशेषांक का विमोचन किया गया। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हुआ यह कार्यक्रम प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

कानपुर से प्रयागराज तक स्मृति की यात्रा

1. 26 सितंबर से 26 अक्टूबर तक, कर्मवीर सुंदरलाल के जन्मदिवस से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी के जन्मदिवस तक, कानपुर में एक माह तक विविध कार्यक्रमों का ऐतिहासिक आयोजन किया गया। इस दौरान स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और सामाजिक चेतना पर केंद्रित कार्यक्रम हुए।
2. 26 नवंबर को अयोध्या कारागार के शहीद कक्ष में काकोरी केस पर दुर्लभ दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी आयोजित की गई। यह आयोजन जेल जैसे प्रतीकात्मक स्थान पर स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति को जीवित करने का सशक्त प्रयास था।
3.17 दिसंबर को गोरखपुर कारागार के रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ बलिदान कक्ष में काकोरी नायकों से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रदर्शनी और संवाद का आयोजन हुआ।
4. 18 दिसंबर को प्रयागराज में ठाकुर रोशन सिंह शहादत स्थल, मलाका जेल पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसके बाद रोशन सिंह बलिदान स्थल से चंद्रशेखर आजाद बलिदान स्थल तक मशाल मार्च निकाला गया, जिसने पूरे शहर को राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग दिया।
5. 19 दिसंबर को काकोरी महानायकों के बलिदान दिवस पर प्रयागराज के ‘शहीद वाल’ पर काकोरी केस के नायकों पर विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

साहित्य, शोध और प्रसारण में महुआ डाबर

वर्ष 2025 में प्रकाशित दो महत्वपूर्ण पुस्तकों के बैक कवर पर महुआ डाबर संग्रहालय की विशेष टिप्पणी प्रकाशित हुई। इनमें हेमंत राजपूत का खंडकाव्य ‘मेहंदी में तलवार’ और सौ वर्ष पूर्व लिखे गए ऐतिहासिक उपन्यास ‘काकोरी डकैती’ का हिंदी अनुवाद शामिल है। यह महुआ डाबर की स्वीकृति का साहित्यिक प्रमाण है।
इस वर्ष सैकड़ों शोधार्थियों, पत्रकारों और लेखकों ने महुआ डाबर पर लेख, विचार और रिपोर्ट लिखकर इसकी सच्ची और प्रेरणादायक कहानी को जन-जन तक पहुंचाया। आकाशवाणी निदेशालय, दिल्ली ने 3 अगस्त को ‘महुआ डाबर : निशां अभी बाकी हैं’ शीर्षक से अपने सभी प्रसारण सेवाओं पर आधे घंटे का विशेष रूपक प्रसारित किया। इलाहाबाद की चर्चित सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘आगाज’ द्वारा महुआ डाबर संग्रहालय को सम्मानित किया जाना भी इस वर्ष की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।

उपलब्धियों के बीच उपेक्षा की पीड़ा

इन सभी उपलब्धियों के बावजूद, महुआ डाबर क्रांति स्थल का सबसे दुखद पहलू यह है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने लंबे समय तक इसे भुलाने की कोशिश की। आज़ादी के अमृत महोत्सव के दौरान उम्मीद की एक किरण तब दिखाई दी, जब महुआ डाबर को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में विशेष स्थान मिला। लेकिन अमृतकाल के बीते तीन वर्षों में भी सरकार की ओर से महुआ डाबर क्रांति स्थल के विकास के लिए अब तक कोई ठोस योजना स्वीकृत नहीं हुई है। यह स्थिति उस स्थल के साथ ऐतिहासिक अन्याय की निरंतरता को दर्शाती है।

महुआ डाबर संग्रहालय आज भी सीमित संसाधनों, लेकिन असीम प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। यह संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल कुछ महान नेताओं की देन नहीं, बल्कि अनगिनत गुमनाम गांवों, परिवारों और शहीदों की कुर्बानी का परिणाम है।
वर्ष 2025 बीत चुका है, लेकिन इस वर्ष ने महुआ डाबर को यह विश्वास दिया है कि इतिहास को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं। यदि नीति, संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति का साथ मिला, तो महुआ डाबर न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए स्वतंत्रता संग्राम की एक सशक्त प्रेरणा स्थली बन सकता है।

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